प्रधानमंत्री के विदेशी दौरे हमेशा चर्चा में रहते हैं। जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय यात्रा होती है, तो लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठता है — आखिर इन यात्राओं पर कितना खर्च होता है और क्या यह खर्च उचित है। 2014 से 2024 के बीच भारत की विदेश नीति काफी सक्रिय रही, इसलिए यात्राओं की संख्या भी अधिक दिखी।
लेकिन इन दौरों को केवल खर्च के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। हर यात्रा के पीछे रणनीतिक उद्देश्य होते हैं — व्यापार, सुरक्षा, निवेश और वैश्विक साझेदारी। इसलिए खर्च और लाभ दोनों को साथ समझना जरूरी है। 🌍
2014–2024 में कुल खर्च कितना हुआ
आधिकारिक जानकारी के अनुसार 2015 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर लगभग ₹762 करोड़ खर्च हुए। यदि 2014 के शुरुआती दौरे और 2026 की शुरुआत जोड़ें, तो कुल अनुमान लगभग ₹800–850 Crore के आसपास माना जाता है।
| वर्ष | खर्च (₹ करोड़) |
|---|---|
| 2015 | 91.5 |
| 2016 | 33.22 |
| 2017 | 44.27 |
| 2018 | 51.46 |
| 2019 | 71.76 |
| 2020 | 0 (Covid की वजह से) |
| 2021 | 36.11 |
| 2022 | 55.82 |
| 2023 | 93.63 |
| 2024 | 109.51 |
| 2025 | 175.19 |
इन आंकड़ों में मुख्य रूप से विमान, सुरक्षा और प्रतिनिधिमंडल यात्रा लागत शामिल होती है। कई खर्च मेजबान देश उठाते हैं, इसलिए वास्तविक कुल लागत इससे अधिक हो सकती है, लेकिन भारत का प्रत्यक्ष खर्च यही माना जाता है।
औसतन प्रति विदेश यात्रा खर्च हाल के वर्षों में लगभग ₹6–8 करोड़ के आसपास रहा है।
खर्च किन चीज़ों पर होता है
प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा सामान्य यात्रा नहीं होती। इसमें सुरक्षा, प्रोटोकॉल और प्रशासनिक व्यवस्था का स्तर बहुत ऊंचा होता है। इसलिए खर्च भी कई हिस्सों में विभाजित होता है।
- विशेष विमान संचालन
- सुरक्षा दल और अग्रिम टीम
- अधिकारी और प्रतिनिधिमंडल यात्रा
- संचार और तकनीकी व्यवस्था
- आधिकारिक कार्यक्रम प्रबंधन
इन सभी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि विदेश में भी सरकार का काम निर्बाध चलता रहे।
विदेश यात्राओं का साल-दर-साल पैटर्न
2014 से 2024 के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का स्वरूप समय के साथ बदलता दिखा। शुरुआती वर्षों में यात्राएं अधिक और व्यापक रहीं, जबकि बीच के वर्षों में रणनीतिक संतुलन और बाद के वर्षों में वैश्विक मंचों पर सक्रिय भागीदारी बढ़ी। यह पैटर्न केवल संख्या नहीं, बल्कि विदेश नीति की दिशा को भी दर्शाता है।
2014–2015 को विदेश नीति का विस्तार चरण कहा जा सकता है। पड़ोसी देशों से संबंध मजबूत करना और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से संपर्क बढ़ाना प्राथमिकता थी। इसी कारण यात्राओं की संख्या अधिक रही और खर्च भी अपेक्षाकृत ज्यादा दिखा।
| चरण | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| 2014–2015 | तेज सक्रियता |
| 2016–2019 | रणनीतिक संतुलन |
| 2020 | कोविड विराम |
| 2021–2023 | वैश्विक पुनर्सक्रियता |
| 2024 | उच्च सक्रियता |
इस पैटर्न से स्पष्ट है कि विदेश यात्राएं केवल संख्या नहीं, बल्कि समय की वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती हैं।
कौन-कौन से देश रहे प्राथमिक फोकस
2014 के बाद भारत की विदेश नीति में कुछ देश लगातार प्राथमिकता में रहे। इन देशों के साथ व्यापार, निवेश, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग प्रमुख कारण रहे। इसलिए वहां यात्राएं भी बार-बार हुईं।
- अमेरिका — रणनीतिक साझेदारी
- यूएई — ऊर्जा और निवेश
- फ्रांस — रक्षा सहयोग
- जापान — अवसंरचना निवेश
- रूस — ऊर्जा और रक्षा
इसके अलावा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी नए संपर्क बढ़ाने के प्रयास दिखे। यह विस्तार वैश्विक व्यापार और संसाधन सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना गया।
विदेश यात्राओं की आवृत्ति अक्सर उस देश के साथ रणनीतिक महत्व को दर्शाती है।
2020 के बाद खर्च क्यों बढ़ा
2020 में महामारी के कारण विदेश यात्राएं लगभग बंद रहीं। लेकिन इसके बाद वैश्विक यात्रा फिर शुरू होने पर गतिविधि तेज हुई। कई यात्राएं मल्टी-कंट्री और लंबी अवधि की रहीं, जिससे खर्च स्वाभाविक रूप से बढ़ा।
साथ ही प्रतिनिधिमंडल का आकार भी कुछ मामलों में बड़ा हुआ। व्यापार, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में संयुक्त चर्चा के लिए अधिक विशेषज्ञ शामिल किए गए।
- मल्टी-कंट्री टूर
- बड़ा प्रतिनिधिमंडल
- लंबी दूरी यात्रा
- वैश्विक मंच कार्यक्रम
इन कारणों से 2023–2025 के वर्षों में खर्च अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है।
क्या खर्च अंतरराष्ट्रीय मानकों से अधिक है
अक्सर तुलना की जाती है कि अन्य देशों के नेताओं की यात्राओं पर कितना खर्च होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष नेतृत्व की यात्राएं अत्यधिक महंगी होती हैं, क्योंकि सुरक्षा और संचार व्यवस्था सर्वोच्च स्तर की होती है।
भारत के मामले में कुल खर्च वैश्विक मानकों के मुकाबले मध्यम श्रेणी में माना जाता है। कुछ बड़े देशों की तुलना में यह काफी कम भी है।
विदेश यात्राओं से भारत को क्या लाभ मिला
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का मूल्य केवल खर्च से नहीं, बल्कि परिणाम से तय होता है। 2014 के बाद भारत ने कई रणनीतिक समझौते और साझेदारियां मजबूत कीं, जिनका सीधा असर अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और वैश्विक छवि पर पड़ा। इन यात्राओं का उद्देश्य यही था कि भारत वैश्विक मंच पर सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाए।
कई बड़े रक्षा और तकनीकी समझौते उच्च स्तर की राजनीतिक बातचीत के बाद ही संभव होते हैं। नेतृत्व स्तर पर संवाद से निर्णय प्रक्रिया तेज होती है और विश्वास बढ़ता है।
- रक्षा सहयोग समझौते
- ऊर्जा आपूर्ति साझेदारी
- निवेश और व्यापार समझौते
- वैश्विक मंचों पर समर्थन
विदेश यात्राएं अक्सर बड़े आर्थिक और रणनीतिक निर्णयों का आधार बनती हैं।
वैश्विक छवि और कूटनीति पर प्रभाव
लगातार अंतरराष्ट्रीय संपर्क से किसी देश की छवि मजबूत होती है। उच्च स्तरीय बैठकों, वैश्विक सम्मेलनों और द्विपक्षीय मुलाकातों से भारत की उपस्थिति विश्व मंच पर अधिक दिखाई देने लगी। इससे भारत को कई वैश्विक मुद्दों पर समर्थन भी मिला।
कूटनीति केवल समझौते नहीं, बल्कि संबंधों का निर्माण होती है। बार-बार संवाद से विश्वास और सहयोग दोनों बढ़ते हैं।
| क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| वैश्विक मंच | प्रभाव बढ़ा |
| व्यापार | साझेदारी मजबूत |
| निवेश | आकर्षण बढ़ा |
| रणनीतिक संबंध | स्थिरता |
खर्च बनाम लाभ: संतुलित दृष्टिकोण
लगभग ₹800 करोड़ का कुल खर्च बड़ा आंकड़ा लगता है, लेकिन इसे 10 से अधिक वर्षों में विभाजित करें तो प्रति वर्ष औसत ₹70–100 करोड़ के आसपास आता है। राष्ट्रीय स्तर पर यह राशि सीमित मानी जाती है, खासकर जब इसे विदेश नीति निवेश के रूप में देखा जाए।
सरकारी स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संपर्क बनाए रखना किसी भी बड़े देश के लिए आवश्यक होता है। व्यापार, सुरक्षा और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग सीधे आर्थिक लाभ से जुड़ा होता है।
- दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ
- आर्थिक अवसर
- वैश्विक प्रभाव
- सुरक्षा सहयोग
विदेश यात्राएं खर्च नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निवेश के रूप में देखी जाती हैं।
सार: पूरा सच क्या कहता है
2014 से 2024 के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं संख्या और सक्रियता दोनों में अधिक रहीं। कुल खर्च लगभग ₹800 करोड़ से अधिक आंका जाता है। यह खर्च सुरक्षा, विमान, प्रतिनिधिमंडल और कार्यक्रम व्यवस्था जैसे कई घटकों में विभाजित होता है।
इन यात्राओं ने भारत की वैश्विक उपस्थिति, व्यापार अवसर और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया। इसलिए केवल लागत देखकर निष्कर्ष निकालना अधूरा दृष्टिकोण होगा। परिणाम और उद्देश्य दोनों को साथ समझना जरूरी है।
कुल मिलाकर, विदेशी दौरों पर हुआ खर्च राष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक सहयोग के संदर्भ में निवेश की तरह देखा जाता है। यही संतुलित और वास्तविक तस्वीर है। 🌍

